Breaking News

कानपुर के दो भाइयों की कमाल की रणनीति, विदेशी ब्रांडों को पछाड़ बनाई 4000 करोड़ की कंपनी

 दरअसल इस मार्केट में घुसने से पहले मुरलीधर ने निरमा की सफलता को बेहद बारीकी से अध्ययन किया। 1970 के दसक में निरमा ने सस्ते डिटर्जेन्ट के रूप में प्रचार की आक्रामक रणनीति बनाई थी, जो बेहद कारगर साबित हुए था।

इस एक रणनीति की बदौलत निरमा का 20 साल तक डिटर्जेन्ट उद्योग पर बोलबाला था। मुरलीधर ने निरमा के ही इस रणनीति को अपनाते हुए उसे ही मात दे दी। सफलता पाने के लिए सिर्फ पैसा की ही नहीं बल्कि मजबूत रणनीति की भी जरुरत होती है। अगर रणनीति मजबूत हो तो युद्ध में अपने से बलवान को भी आसानी से परास्त किया जा सकता है।

 आज हम बात कर रहे हैं देश के डिटर्जेन्ट उद्योग में क्रांति लाने वाले कानपुर के दो भाइयों की। साल 1988 में मुरलीधर अपने भाई बिमल ज्ञानचंदानी के साथ मिलकर देश के डिटर्जेन्ट उद्योग में घुसने का फैसला किया। हालांकि उस दौर में भी कुछ डिटर्जेन्ट कंपनियां जैसे निरमा और सर्फ मार्केट में अपनी पैठ जमा चुका था। लेकिन फिर भी अपनी दमदार रणनीति की बदौलत इन भाइयों ने 'घड़ी साबुन'की नींव रखी।


हिन्दुस्तान लीवर और प्रोक्टर एंड गैम्बल जैसे मल्टीनेशनल समूह के सामने घड़ी कुछ नहीं था। कायदे से देखें तो देश की कुल डिटर्जेन्ट मांग का 16 फीसदी सिर्फ उत्तर प्रदेश से आता है, इसलिए खामोशी के साथ घड़ी ने सबसे पहले इसी राज्य के लोगों का विश्वास जीता। उत्तर प्रदेश में मिली सफलता के बाद घड़ी ने अपनी प्रसिद्ध स्लोगन "पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें" के जरिए मध्य प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी जंग जीत ली। शुरूआती सफलता के बाद घड़ी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

बेरोजगार नौकरी से परेशान हो तो सरकार ने आपके लिए 45000 से अधिक पदों पर निकाली भर्ती, 8th/10th पास करे आवेदन, यहाँ क्लिक करें
close