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कुछ इस तरह से था 42 लाख साल पहले बंदरों का हाल, जानकर हो जाएगे हैरान…


बता दें, ये दावा किया जा रहा है कि यह बंदर की ऐसी प्रजाति है जिसका वजन सिर्फ 1 किलोग्राम होता था. इस नई प्रजाति का आकार विश्व के सबसे छोटे पुराने समय के बंदर ‘टैलापोइन’ जैसा ही है. आप सोच ही सकते है कि एक किलों के इस बंदर का आकार कितना छोटा होगा. इसके अलावा जीवाश्म बताता है पर्यावरण में कितना बदलाव हुआ है. केन्या नेशनल म्यूजियम के फेड्रिक कयालो के मुताबिक, 42 लाख साल पुराना बंदर का जीवाश्म बताता है कि पर्यावरण में कितना बदलाव हुआ है. इसका असर टैलापोइन और नैनोपीथेकस ब्राउनी दोनों पर हुआ था.

वहीं उन्होंने जीवाश्म को यहां के म्यूजियम में रखा गया है. शोधकर्ताओं ने बताया कभी केन्या के सूखे घास के मैदान इनका घर हुआ करते थे. शोधकर्ताओं के मुताबिक, ‘नैनोपीथेकस ब्राउनी की खोज बताती है कि इनकी उत्पत्ति में केन्या का बड़ा योगदान रहा है. इनकी सबसे ज्यादा प्रजाति यहां के पर्यावरण में बढ़ती हैं. यह दूसरी सबसे पुरानी बंदरों की प्रजाति है. नैनोपीथेकस ब्राउनी केन्या के पूर्वी क्षेत्र कानापोई में पाए जाते थे.

 यह शुष्क और जंगली क्षेत्र के तौर पर जाना जाता है. कानापोई में ही नैनोपीथेकस के साथ मानव के शुरुआती पूर्वज ऑस्ट्रेलोपिथीकस अनामेन्सिस भी मौजूद थे. ह्यूमन इवोल्यूशन जर्नल में प्रकाशित इस शोध के अनुसार, इसका नामकरण वैज्ञानिक फ्रेंसिस बाउन के नाम पर किया गया था. जिन्होंने ऊटा यूनिवर्सिटी में कानापोई क्षेत्र के बारे में लंबे समय रिसर्च की थी.

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