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सुहागन होने के बाद भी विधवा जैसी जिन्दगी जीती हैं यहां की महिलाएं, इसके पीछे की परम्परा जानकर काँप जाएगी रूह.....

यह एक ऐसी परंपरा है जिसपर विश्वास करना मुश्किल है लेकिन वर्षों से ऐसा होता आ रहा है। यहां की महिलाएं सुहागन होने के बाद भी तीन माह तक मांग में सिंदूर नहीं भरती और पति के सलामती के लिए अपने इष्ट की पूजा में जुटी रहती है। तीन माह बाद जब पति वापस लौटता है तो वे फिर सुहागन की तरह जीवन व्यतीत करने लगती है। ऐसा हर साल होता है। महिलाओं को इस टोटके पर पूरा भरोसा है। वहीं परिवार के लोगों को विश्वास है कि ऐसा करने से ही उनके अपने सलामत रहते है।

यह परम्परा गछवाह समुदाय से जुडी है।  यह समुदाय पूर्वी उत्तरप्रदेश के गोरखपुर, देवरिया और इससे सटे बिहार के कुछ इलाकों में रहता है।  ये समुदाय ताड़ी के पेशे से जुड़ा है। इस समुदाय के लोग ताड़ के पेड़ों से ताड़ी निकालने का काम करते है।

ताड़ के पेड़ 50 फीट से ज्यादा ऊंचे होते है तथा एकदम सपाट होते है।  इन पेड़ों पर चढ़ कर ताड़ी निकालना बहुत ही जोखिम का काम होता है। ताड़ी निकलने का काम चैत मास से सावन मास तक, चार महीने किया जाता है।

गछवाह महिलाये, इन चार महीनो में ना तो मांग में सिन्दूर भरती है और ना ही कोई श्रृंगार करती है। वे अपने सुहाग कि सभी निशानियां तरकुलहा देवी के पास रेहन रख कर अपने पति की सलामती की दुआ मांगती है।

लेकिन इसे अंधविश्वास कहें या फिर अपने पति के लिए इन औरतों का प्यार, जो इन्हें सुहागन होते हुए पति की सलामती के लिए विधवा बनने पर मजबूर कर देता है।

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