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जिस उम्र आमतौर पर लोग बिस्तर पकड़ लेते हैं, उस उम्र में कर दिखाया…. ऐसा काम जानकर रह जाओगे दंग....

बाबू वीर कुंवर सिंह मूल रूप से बिहार के भोजपुर जिले के रहने वाले थे. वीर कुंवर सिंह का जन्म 1777 में बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव में प्रसिद्ध शासक भोज के वंशजों में हुआ था. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 25 जुलाई 1857 से 23 अप्रैल 1858 के बीच उन्होंने 15 बड़ी लड़ाइयां लड़ी. इस भोजपुरी शेर की गौरव गाथा आज भी यहां के युवाओं को प्रेरित करती है.

बाबू वीर कुंवर सिंह के पिता बाबू साहबजादा सिंह उज्जैनिया क्षत्रियों के वंशज थे. वहीं कुंवर सिंह की माता का नाम पंचरत्न कुंवर था. जगदीशपुर गांव के लोग ऐसा बताते हैं कि कुंवर सिंह बचपन से ही वीर थे. उनपर बंदूक चलाने और घोड़ा दौड़ाने का नशा सवार रहता था. वह छूरी-भाला और कटारी चलाने का भी अभ्यास करते रहते थे

इतिहासकारों ने लिखा है कि साल 1857 के विद्रोही नेताओं में युद्ध विद्या की कला की योग्यता रखने वाले कुंवर सिंह से बढ़कर कोई नेता नहीं था. वीर कुंवर सिंह ने छोटी सी सेना और बहुत कम साधन के बलबूते ही अपनी मिट्टी की रक्षा की. 80 साल की उम्र में जिस तरीके से वह तलवार चलते थे कि उसका लोहा अंग्रेज भी मानते थे. 1857 के नवंबर महीने में कानपुर की एक क्रांतिकारी युद्ध में बाबू कुंवर सिंह की महती भूमिका रही थी. इस दौरान इन्होंने तात्या टोपे, नवाब अली बहादुर, नवाब तफच्चुल हुसेन और राय साहब पेशवा के अधीन फिरंगियों से लोहा लिया था. इस वीर महानायक ने 26 मार्च 1858 को आजमगढ़ पर पूर्ण रूप से कब्जा कर लिया था, जिसकी गाथा सुनकर आज भी युवाओं में एक अनूठी ऊर्जा का उत्सर्जन होता है.


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