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भारत से पंगा लेकर बर्बाद हुए जिनपिंग, लद्दाख में मिली हार, बीजिंग में कुर्सी छोड़ने को 90 दिनों की मोहलत

चीनी राष्ट्रपति ने कोरोना काल के शुरुआत से ही आक्रामक कूटनीति यानि wolf warrior diplomacy का रास्ता अपनाया हुआ है। चीन को लगा था कि उसकी धमकियों और गीदड़ भभकियों के आगे दुनिया घुटने टेक देगी, लेकिन आज आलम यह है कि दुनियाभर में चीनी सरकार और सेना को मुंह की खानी पड़ रही है। भारत-अमेरिका जहां चीन के टेक क्षेत्र को बर्बाद करने की योजना पर लगातार काम कर रहे हैं, तो वहीं दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया के देश भी चीन को आड़े हाथों ले रहे हैं। यही कारण है कि अब चीन की ताकतवर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी(CCP) के रिश्ते में खटाई देखने को मिल रही है।



इसके अलावा जिनपिंग के कई तानाशाही फैसलों की वजह से कम्युनिस्ट पार्टी में ही उनके खिलाफ बगावत की चिंगारी सुलग रही है। सीपीसी और पोलित ब्यूरो के कई धड़े जिनपिंग को सत्ता से बेदखल करना चाहते हैं। अपने विरोधियों के खिलाफ जिनपिंग की बेरहमी की कहानियां भी आवाम के आक्रोश को बढ़ा रही है। साथ ही देश में बेरोजगारों की तादाद भी तेजी से बढ़ती जा रही है। इन सब को देखते हुए जिनपिंग को ये डर सताने लगा है कि कहीं 2022 में होने वाले चुनाव से पहले सीपीसी उनके पैरों के नीचे से चीन की सत्ता की कुर्सी खींच ना ले।

खबर यही है कि नवंबर से पहले चीन में जिनपिंग का तख्तापलट किया जा सकता है। इस बात की पूरी-पूरी संभावना है नवंबर से पहले चीन की सत्ता से जिनपिंग की हमेशा-हमेशा के लिए विदाई हो जाए। इसकी संभावना इसलिए भी और बढ़ गई है, क्योंकि जिनपिंग के खिलाफ पहले से ही चीन में आक्रोश का माहौल है। चीन की आवाम जिनपिंग सरकार के तानाशाही रवैये से परेशान तो है ही, साथ ही साथ देश में लगातार बढ़ती बेरोजगारी ने भी जिनपिंग के खिलाफ गुस्से को और बढ़ा दिया है।

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