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चीन को सबक सिखाएगा अब तालिबान, तालिबान ने जारी किया चीन का डेथ वॉरंट, आप पॉपकॉर्न के साथ लीजिए इस लड़ाई का मज़ा!

चीन जहां इस्लामिक आतंकवाद पर काबू पाना चाहता है, वहीं उसका सहयोगी पाकिस्तान अपने कई पड़ोसी देशों में आतंवादी गुटों को सहायता दे रहा है। इसलिए चीन जरूर चाहेगा कि पाकिस्तान की मदद से वह इस क्षेत्र में जारी इस्लामिक आतंकवाद पर लगाम लगाए। इससे उसकी अरबों डॉलर की परियोजनाओं पर से खतरा खत्म हो जाएगा।



दावा किया गया है कि तालिबान के साथ चीना का पुराना संबंध है। जब 1990 के दशक में अफगानिस्तान में तालिबान सत्ता में था तब चीन ने सीधे संचार चैनल स्थापित किए थे। यह बात है कि आजतक कभी भी तालिबान को चीन का विरोध करते नहीं देखा गया है। फिर भी चीन की तालिबान पर सीधी पकड़ नहीं है। वह अपने दोस्त पाकिस्तान की मदद से ही तालिबान के साथ कोई डील कर सकता है।

तालिबान का जन्म 90 के दशक में उत्तरी पाकिस्तान में हुआ। इस समय अफगानिस्तान से तत्कालीन सोवियत संघ (रूस) की सेना हारकर अपने देश वापस जा रही थी। पश्तूनों के नेतृत्व में उभरा तालिबान अफगानिस्तान में 1994 में पहली बार सामने आया। माना जाता है कि तालिबान सबसे पहले धार्मिक आयोजनों या मदरसों के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराई जिसमें इस्तेमाल होने वाला ज़्यादातर पैसा सऊदी अरब से आता था। 80 के दशक के अंत में सोवियत संघ के अफगानिस्तान से जाने के बाद वहां कई गुटों में आपसी संघर्ष शुरु हो गया था जिसके बाद तालिबान का जन्म हुआ।

दोहा में जारी इस वार्ता के दौरान दोनों पक्ष कठिन मुद्दों को सुलझाने का प्रयास करेंगे। इनमें स्थायी संघर्ष विराम की शर्तें, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकार और हजारों की संख्या में तालिबान लड़ाकों का हथियार छोड़ना भी शामिल है। दोनों पक्ष संवैधानिक संशोधनों और सत्ता बंटवारे पर भी बातचीत कर सकते हैं।

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