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लाटू देवता मंदिर का है अनोखा मंदिर, पूजा के लिए साल भर में एक दिन खुलता है मन्दिर, पुजारी आंखों में पट्टी बांधकर करते है पूजा, वजह जानकर रह जाओगे दंग

माँ नंदा की डोली जब भी यहाँ से गुजरती है उनकी डोली-छंतोली यहाँ पर लाटू से भेंट करती है. उसके बाद यहाँ से लाटू का प्रतीक लेकर ही यात्रा आगे के लिए निकलती है. प्रति वर्ष लगने वाली नंदा जात और बारह साल में होने वाली नंदा राजजात में लाटू देवता का महत्त्व बहुत ज्यादा है. वाण से आगे पार्वती का ससुराल माना गया है और यहाँ से आगे नंदा के भाई के रूप में लाटू के प्रतीक ही उन्हें शिव के पास हिमालय छोड़कर आते हैं.



लाटू देवता मंदिर के कपाट पूरे वर्ष में केवल एक दिन बैशाख पूर्णिमा के दिन खुलते हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि यहां लाटू देवता एक बड़े नाग के रूप में विराजमान हैं. इसी कारण मंदिर के गर्भगृह में जाकर केवल पुजारी ही पूजा करता है. जब पुजारी मंदिर में पूजा के लिये प्रवेश करता है तो वह आँखों में पट्टी बांधकर गर्भगृह में जाता है. 

कुछ लोगों का मानना है कि विशाल नाग देखकर कहीं पुजारी डर न जाये इस वजह से पुजारी की आंखों में पट्टी बाँधी जाती है तो कुछ लोगों का मानना है गर्भगृह में विराजमान नागमणि के दर्शन ने पुजारी की आँखों की ज्योति जा सकती है अतः आँखों में पट्टी बाँधी जाती है. अन्य लोग मंदिर गर्भगृह से 75 फीट की दूरी से ही लाटू देवता की पूजा करते हैं. वैशाख पूर्णिमा के दिन जब लाटू देवता मंदिर के कपाट खुलते हैं उस दिन मंदिर में "विष्णु सहस्रनाम" व "भगवती चंडिका" का पाठ आयोजित किया जाता है।

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